Sunday, May 24, 2009

परदे का सपना :

आज सिनेमा के परदे के साथ ही उसका भावः भी बदल गया है । पहले पुराने ज़माने की फिल्मो में भावनाए,विचार ,संदेश होती थी वाही आजकल की फिल्मो में सिर्फ़ कल्पनाये तक ही सीमित है । पहले की फिल्मो में रिश्तो की महत्व को दिखलाया जाता था जबकि आज के दौर के फिल्मो में रिश्तो को मज़बूरी रूप में परोसा जा रहा है । पहले की जो heroin होती थी अगर हीरो बुरा काम करता था तो वह उसे सही रस्ते पे चलने की सलाह देती थी वाही आज की heroin उनके बुरे कामो में कंधे से कन्धा मिलाकर चलती है। उस ज़माने की फिल्मो में हमारी संस्कृति , सभ्यता, संस्कार को दिखलाया जाता था जबकि आज की फिल्मो में सिर्फ़ और सिर्फ़ सेक्स को ज्यादा दिखलाया जा रहा है। पहले ज्यादा से ज्यादा कपड़ो को बदन पे दिखाया जाता था,जबकि आज जितना खुला बदन रहेगा दर्शक उतने ही फिल्मो तक खिचे चले आते है।
पहले फिल्मो में भावुकता को दिखाया जाता था ,अब की फिल्मो कामुकता को दिखाया जाता है।

पहले की फिमो को हम पुरे परिवार के साथ बैठ कर देखते थे ,अब हम फिल्मो को अकेले अकेले देखते है। आज का यह सिनेमा सिर्फ़ पैसा कमाने के चक्कर में लोगो को अपने रूप में ढाल रही है ।
क्या अब ऐसा कोई निर्देशक नही है जो पहले की तरह फ़िल्म बनाये.जो लोगो को संस्कार सभ्यता ,संस्कृति को फ़िर से परिचित कराये।
कहते है फिल्मे समाज का आइना होती है ,तो कोई हमें उस आईने में हमारे समाज की तस्वीर को दिखाए ।
आज फिल्मो ने हमारी जीवन शैली को पुरी तरह से प्रभावित कर दिया है। आज लोगो में एक दुसरे के प्रति सम्मान की भावना कम हो गई है।
पहले जब हम किसी अपने को कही देखते थे तो हम उनकी नज़रो में बसने की कोशिस किया करते थे वही आज जब हम इस तरह से मिलते है तो नज़र छुपाने की कोशिश करते है।
क्या फ़िर पुराणी फिल्मो की तरह का दौर आएगा??????????????????????????

Saturday, May 23, 2009

अपना देश पराये लोंग

आज अगर गांधीजी जिन्दा होते तो शायद यही सोचते कि देश तो अपना हो गया है लेकिन लोग पराये हो गए है।

गांधीजी जिन्होंने देश को आजाद कराने में अपनी प्राणों की आहुति दे दी । जिन्होंने देश को सत्य और अहिंसा के बदौलत अंग्रेजो को भारत से भगाया । उन्होंने देश को बचाने के खातिर न जाने कितनी बार अनशन का रास्ता अपनाया ,न जाने कितनी बार जेल गए । आज उन्ही के देश में सत्य और अहिंसा ये सब ख़त्म होते जा रहे है। वो देश को शांतिमय बनाना चाहते थे ,मगर उनके जाते ही उनके इस सपने को तोडा जाने लगा और चारो तरफ़ अशांति फैलने लगी। गाँधी जी जिनका नाम सुनकर ही उनके ज़माने के लोग बुराई छोड़कर सत्य की तरफ़ चले जाते थे ,लेकिन आज लोग उन्ही का नाम इस्तेमाल करते है और सामने वाले से यह कहते है की हमें हरे हरे नोट चाहिए जिसमे गांधीजी छपे हो । लोंग आज उन्ही के फोटो के सामने रिशवत लेते है देते है और सामने दीवार पर टंगे उनकी तस्वीर यह सब देखकर मुस्कुराती है शायद वो अपने आप पे हस्ते है की ये मुझसे क्या हो गया । मैं तो चाहता था की लोंग बिना की स्वार्थ के लोगो की सेवा करे लेकिन यहाँ तो बिना नोट के कोई किसी की मदद नही करता है । सब कुछ तब भी ठीक चल रहा था की अचानक एक दिन ख़बर आई की गांधीजी की नीलामी हो रही है अब लोंग उनको नीलाम करने की तैयारी में लगे हुए है , फिर बाद में पता चला की उनके कुछ सामान है जिनकी बोली लगने जा रही है ।

सुनकर बहुत दुःख हुआ की जिसने अकेले दम पर देश को लुटने से बचाया , आज वही देश मिलकर एक अकेले व्यक्ति का नाम नही बचा प् रही है, यह हमारे देश के लिए बड़ी शर्म की बात है ।

Wednesday, May 6, 2009

और मैं कस्ट से मर गया

आज सुबह -सुबह अचानक मेरे फ़ोन की घंटी बजी ,मैं गहरी नींद सपनो की दुनिया में खोया हुआ था । फ़ोन मेरे सिराहने पर ही था जिससे फ़ोन की घंटी की आवाज़ मेरे कानो में मछ्छर की भिनभिनाहट की तरह आने लगी । फिर मैं सपनो की दुनिया से निकलने लगा और हकीकत की दुनिया में आ ही रहा था ,और नींद में हिमैने फ़ोन को उठाया और बिना नाम का नम्बर देखकर मेरा मन्न्कई जगह भटक गया । सबसे पहले मेरे दिमाग घर की और गया क्योंकि घर से ही सुबह -सुबह फ़ोन आता था लेकिन घर का फोन होने के बाद मेरा दिमाग मेरे दोस्तों के उपर गया कही मेरा कोई जान पहचान का नही है जो दोस्त का भी फ़ोन दोस्त का भी फ़ोन , दोस्त का भी फ़ोन नही था. फ़ोन किसी नो. से आ रहा था और मेरा मनन और साँस दोनों तेजी के साथ बढ़ते ही जा रहा था.जब मैंने फ़ोन का बटन दबाया तो वह किसी लड़की की आवाज़ थी जिसमे वो सिर्फ़ बोलती जा रही थी वह मेरी हल्लो का जवाब भी नही दे रही थी. फ़ोन कस्त्मेर केयर से था . जब मैंने सुना की वो कस्टमर केयर से बोल रही है तो मैं एक बार फिर kastसे मर गया , यानि की मैं फिर सो गया.

ये फ़ोन की घंटी जो कभी खुशियों की बहार लती है तो कभी दुःख भरी दास्ताँ सुनती है. ये घंटी जो हमारे दिल को झन्ना देती है, ये वोक्त और बेवक्त दोनों समय में कभी भी आ सकती है

Tuesday, May 5, 2009

शिस्टाचार या भ्रस्टाचार

देश की सभी समस्याओ की जड़ भ्रस्टाचार है । चाहे वह राजनितिक हो ,व्यापर हो सिक्षा हो, सरकारी दफ्तर हो सभी भ्रस्तचार में लिप्त है । आज किसी भी सरकारी दफ्तर में जाए तो बिना सुविधा शुल्क दिए आपका कोई कम नही होने वाला होगा .कोई भी नेता कभी अपने भाषण में यह नही कहता कि मैं भ्रष्टाचार को समाप्त कर दूंगा। बस यही कहेंगे कि ५ साल उसने क्या किया ,इस बार मुझे सेवा करने का मौका दे । इन शब्दों से तो ऐसा प्रतीत होता है कि ५ साल उसने लुटा ,इस बार मुझे लुटने का मौका दीजिये ,मैं देश को अविकास कि और ले जाऊंगा .अब तो देश कि जनता को विकास चाहिए या अविकास फ़ैसला उनके हाथो में ......................................?